हताश और निराश | धनक विदेशी और भारतीय बाज़ारों के बीच खाई गहरा रही है—जिनपर विदेशी जुनून सवार है उनके भ्रम में न पड़ें
फ़र्स्ट पेज audio-icon

हताश और निराश

विदेशी और भारतीय बाज़ारों के बीच खाई गहरा रही है-जिनपर विदेशी जुनून सवार है उनके भ्रम में न पड़ें

इक्विटी मार्केट में ऐसा दौर आता है जब धारणाएं दो-फाड़ होने लगती हैं। एक ही समय में, कुछ निवेशक बिकवाली की मनःस्थिति में होते हैं, और कुछ दूसरे समझ रहे होते हैं कि ठीक है—ये स्थिति बहुत अच्छी तो नहीं, या शायद अच्छी भी न कही जा सके, पर कम-से-कम ठीक-ठाक तो है ही। ऐसे मौक़ों पर मीडिया की भागीदारी अति-उत्साह की होती है और नज़रिया, नकारात्मक भाव लिए रहता है। मौजूदा वक़्त और दौर ऐसा ही है।

बाज़ार के हालात को लेकर, ये अलग-अलग नज़रिए उन बचत करने वालों और निवेशकों के लिए उतना मायने नहीं रखते जो अपना निवेश अच्छी तरह मैनेज करते हैं। हालांकि, सोशल-मीडिया और मास-मीडिया में, निराशावादी आवाज़ें, आशावादी आवाज़ों से ज़्यादा बुलंद होती हैं। इसका सीधा असर बचत करने वालों पर होता है और उनकी मनःस्थिति में भी निराशा भर देता है। कुछ लोगों पर तो इस हद तक असर होता है कि वो अपना निवेश ही बंद कर देते हैं—और अगर आप बरसों से निवेश करते आ रहे हैं, तो मार्केट के कमज़ोर होने पर निवेश रोक देना बड़ा ही ग़लत फ़ैसला होता है।

मौजूदा दौर में, ये अलग नज़रिया भारत और यूएस मार्केट के अलग-अलग व्यवहार का एक साइड-इफ़ैक्ट लगता है। यूएस-केंद्रित नज़रिए के हावी रहने की वजह से जिसे इन्वेस्टमेंट ट्विटर, इन्वेस्टमेंट इंस्ट्राग्राम और ऐसे ही और सोशल मीडिया के प्रभाव के चलते, बचत करने वाले, ख़ुद को हताश और निराश महसूस करने लगते हैं। इन्वेस्टमेंट ट्विटर पर कुछ इस तरह के सवाल हावी रहते हैं, जैसे - मंदड़ियों का मार्केट (bear market) और कितने समय तक हावी रहेगा, क्या होगा अगर ब्याज दरें बढ़ती ही रहती हैं, क्या होगा अगर मंदी आ जाएगी, क्या लंबे समय में स्टॉक मार्केट वापस उबर पाएंगे, और अगर मैं अभी बेचता हूं, तो फिर दोबारा कब ख़रीदूं?

ये वो सवाल ही नहीं हैं जिसकी चिंता मुझे या आपको करनी चाहिए। ये सारी चिंताए और भी हैरान करने वाली इसलिए हैं क्योंकि अमेरिकी बाजारों और भारतीय बाजारों के बीच काफ़ी अंतर है। पिछले छः महीनों में, हमारा सेंसेक्स कमोबेश सपाट रहा है (डाउन 1.6%), वहीं अमेरिकी S&P 500 ने अपनी वैल्यू का पांचवां हिस्सा गंवा दिया है (डाउन 19.6%)। 20% की गिरावट का मनोवैज्ञानिक प्रभाव काफ़ी बड़ा होता है। मीडिया में, जब आप यूएस के निवेशकों की मनःस्थिति को जान-समझ रहे होते हैं, तो आप एक ऐसे व्यक्ति की बातों को ग्रहण कर रहे होते हैं जो ख़ुद को बडी मुसीबत में पड़ा हुआ मानते हैं। आपको ये नकारात्मकता ग्रहण करने की कोई ज़रूरत नहीं है और इसे ख़ुद पर हावी तो कतई नहीं होने देना चाहिए।

और ये बहुत संभव है कि हम भी उसी मोड़ पर ठीक पीछे खड़े हों—यानि कुछ ही हफ़्तों या महीनों में, भारतीय इक्विटी मार्केट भी इसी दिशा में चल पड़े। और असल में ऐसे बहुत से अनुभवी निवेशक हैं जो इस ख़याल पर बड़ा यक़ीन रखते हैं। इसमें भी कुछ नया नहीं है— आगे क्या होने वाला है इसे लेकर अनिश्चितता हमेशा रहती ही है। हताशा और निराशा की तस्वीर को क़ायम रखने के लिए हमेशा ही कोई-न-कोई तर्क मौजूद रहता ही है। इसीका नतीजा है कि निराशावादी हमेशा ही ज़्यादा ज्ञानी मालूम पड़ते हैं।

हालांकि, मेरा कहना है कि आपके लिए ये सब मायने नहीं रखता। मायने रखता है कि जहां आपने निवेश किया है उसमें रिस्क इस बात का है कि आपने किस दाम पर निवेश किया है, और आपको अपने पैसे वापस कब चाहिए। हम एक अनिश्चितता के दौर की तरफ़ ज़रूर जा रहे हैं, पर ये एकदम रिस्क से भरा ही हो, ऐसा नहीं है। असल में, होता ये है कि जब भी स्टॉक के दाम गिरते हैं, तो अच्छे स्टॉक और कम रिस्की हो जाते हैं।

और हां, मैं सिर्फ़ वही बता रहा हूं जो एक प्रसिद्ध बात है, कि जब सड़कों पर ख़ून हो तब निवेश करो। ये सच है कि जितना ऊंचा दाम, उतना ज़्यादा रिस्क। इसी तरह जितना कम दाम, उतना कम रिस्क। इससे, ये साबित होता है कि जब मार्केट कमज़ोर होने लगते हैं, तो रिस्क कम हो जाता है।

इस मुक़ाम पर, सवाल है कि हेडलाइन और सोशल मीडिया का कहना हमेशा उलटा ही क्यों होता है। ऐसा इसलिए क्योंकि वो पंटर के नज़रिए से सोचते हैं, न कि निवेशक के। ये आइडिया, कि अनिश्चितता (और उतार-चढ़ाव) एक रिस्क नहीं है स्वीकार करना ज़रा मुश्किल है, मगर ऐसा समझना महत्वपूर्ण है, ख़ासतौर पर क्योंकि रिस्क की औपचारिक परिभाषा हमेशा ही उतार-चढ़ाव पर फ़ोकस करती है। एक स्मार्ट इन्वेस्टर को इसे समझना चाहिए।


दूसरी कैटेगरी