घबराहट से उत्साह हार जाता है | धनक निवेशक अपने निवेश के मुक़ाबले कम कमा पाते हैं। आप सोचेंगे ये कैसे हो सकता है? ये इस तरह होता है
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घबराहट से उत्साह हार जाता है

निवेशक अपने निवेश के मुक़ाबले कम कमा पाते हैं। आप सोचेंगे ये कैसे हो सकता है? ये इस तरह होता है

कुछ साल पहले, एक्सिस म्यूचुअल फ़ंड की एक स्टडी के हवाले से ख़बर थी कि निवेशक जिस फ़ंड में निवेश करते हैं, उस फ़ंड के मुक़ाबले, उस फ़ंड में उनके अपने निवेश का रिटर्न कम रहता है। सरसरी तौर पर देखने पर निवेश का गणित समझने वाले किसी भी शख़्स को ये बेतुकी बात लगेगी। मगर क़रीब से देखेंगे, तो समझ जाएंगे कि यहां हो क्या रहा है। दरअसल, इसे समझने का राज़, गणित में नहीं बल्कि लोगों के व्यवहार में छुपा है।
एक्सिस की स्टडी रिपोर्ट के मुताबिक़, AMC ने पिछले 20 साल में, 2022 के मार्च महीने तक मिलने वाले म्यूचुअल फ़ंड रिटर्न्स की जांच की। इस अंतराल में, एक्टिवली-मैनेज किए गए इक्विटी म्यूचुअल फ़ंड्स में औसत सालाना रिटर्न 19.1 प्रतिशत रहा था, मगर इन फ़ंड्स के निवेशकों ने केवल 13.8 प्रतिशत ही कमाए थे। ये एक बड़ा फ़र्क़ है, और मेरा मतलब है सचमुच में बड़ा फ़र्क़। पिछले 20 साल में, 19.1 प्रतिशत का मतलब हुआ, ₹1 लाख का निवेश बढ़ कर ₹33.0 लाख हो गया। वहीं, 13.8 प्रतिशत का मतलब हुआ कि ये केवल ₹13.3 लाख ही बढ़ पाया। ये ज़िंदगी बदल देने वाला फ़र्क़ है-ठीक वैसा ही, जैसे अमीरों और मिडिल क्लास वालों के बीच का फ़र्क़ हो। इसी तरह, हाइब्रिड फ़ंड्स ने 12.5 प्रतिशत रिटर्न दिए, मगर निवेशकों ने क़रीब 7.4 प्रतिशत ही कमाए। फिर से, ये फ़र्क़ बहुत बड़ा है। ₹1 लाख के निवेश पर, ये फ़र्क़ ₹10.5 लाख और ₹4.2 लाख का हुआ।
मगर मेरे अनुभव कहता है कि एक ये आम बात है। मैं हमेशा ही मानता रहा हूं कि फ़ंड को मिलने वाले असल मुनाफ़े के मुक़ाबले, निवेशक कहीं कम मुनाफ़ा कमाते हैं। पर ऐसा होता क्यों है? मैं शर्तिया तौर पर कह सकता हूं कि इस लेख को पढ़ने वाले इसका जवाब आसानी से दे सकते हैं।
दरअसल, हम निवेशक, अपने ही सबसे बड़े दुश्मन हैं। एक तरफ़, हम निवेश के लिए बेस्ट म्यूचुअल फ़ंड चुनने पर अमादा रहते हैं और दूसरी तरफ़, हम फ़ंड्स को ग़लत समय पर ख़रीदते, और ग़लत समय पर बेचते हैं। और ये काम कुछ इस तरह करते हैं कि मुनाफ़े का कम होना, एक गारंटी हो जाए। नतीजा ये होता है-कि हम फ़ंड तो अच्छे चुनते हैं, पर बैंक के फ़िक्स डिपॉज़िट से बेहतर रिटर्न नहीं कमा पाते। बुनियादी तौर पर, आप इसे ‘उत्साह में ख़रीदो, घबराहट में बेचो’ या buy on excitement, sell on panic कह सकते हैं। मुझे तो लगता है कि इस वाक्य का, मुझे कॉपीराइट करा लेना चाहिए। आप इसे गूगल में तलाशेंगे तो आपको ये जुमला कहीं नहीं मिलेगा, इसलिए मैं मानता हूं कि इसे मैंने ही गढ़ा है!
इस जुमले का मतलब साफ़ है। लोग तभी निवेश करते हैं, जब इक्विटी मार्केट में उत्साह छाया हो। यानि, जब दाम पहले ही आसमान छू रहे होते हैं। फिर बेचते तब हैं, जब बड़े पैमाने पर घबराहट फैली हो, और इक्विटी के दाम क्रैश कर रहे होते हैं, और म्यूचुअल फ़ंड के NAV नीचे लुढ़क रहे होते हैं। कुल मिला कर इसका मतलब हुआ, ‘मंहगा ख़रीदो, सस्ता बेचो,’ और ये उसके ठीक उलट है जो किया जाना चाहिए। बजाए निवेश की 'श्रेष्ठ' रणनीति पता करने के, ऐसा व्यवहार निवेश की 'निकृष्ट' रणनीति की तरफ़ ले जाता है।
नोट करें कि मैं यहां म्यूचुअल फ़ंड्स की बात सिर्फ़ इसलिए कर रहा हूं, क्योंकि मेरी बात शुरु ही हुई थी, एक म्यूचुअल फ़ंड कंपनी द्वारा कराई गई स्टडी को लेकर। मैंने यहां जो भी कहा, वो इक्विटी निवेशकों पर लागू होता है, सिवाए इस बात के, कि इक्विटी में इस तरह की साफ़ सुथरी तुलना मुश्किल है। असल में, स्टॉक में दो तरह की ग़लतियां होती हैं, पहली है, जल्दी बेच देना और दूसरी है, बेचने में बहुत देर कर देना। और हां, स्टॉक निवेश एक अलग तरह का निवेश भी है।
लोग स्टॉक ख़रीदते हैं, और जब उन्हें लगता है कि ये उतना बढ़ गया है जितना बढ़ सकता था, तब वो उसे बेच देते हैं और इस तरह से अपना मुनाफ़ा भुना लेते हैं। असल में, उन्हें लगता है कि ऐसा न करने से उनका मुनाफ़ा हाथ से फिसल जाएगा, या कम हो जाएगा। और बाद में उन्हें पछताना पड़ सकता है या नुक़सान की शर्मिंदगी उठानी पड़ सकती है जो एक बुरी बात होगी। जब आप किसी बिज़नस को ऊंचे मुनाफ़े के साथ ख़त्म करते हैं, तो सफलता का एहसास बड़ा लुभावना होता है। एक बड़ी जीत की तरह। इस रवैये का एक शैतान जुड़वां भाई भी है, और वो है-पिटे हुए निवेश को ढोते रहना। मुनाफ़े को कुछ जल्दी भुना लेने में, निवेशक जीत पक्की करने के लिए प्रेरित होते हैं। और किसी ख़राब निवेश को बनाए रखने में उनकी प्रेरणा, हार से बचने की होती है। कुल मिला कर नतीजा ये होता है कि निवेशक विजेता से हाथ धो बैठते हैं और थके-हारे निवेश को थामे बैठे रहते हैं।
काश, मैं कह पाता कि एक बार निवेशक इस मुश्किल को समझ लेते, तो वो इन ग़लतियों से बचने के लिए क़दम उठा सकते हैं। मगर, जिन ग़लतियों की जड़ें निवेशकों के मनोविज्ञान से जुड़ी हों, उसे समझ जाने के बावजूद ठीक कर पाना आसान नहीं होता। कुछ लोग इसे दुरुस्त कर पाएंगे, कुछ नहीं। इंसान का दिमाग़ इसी तरह काम करता है।


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