मेडिकल ख़र्च की त्रासदी | धनक भारत को मेडिकल ख़र्च में पारदर्शिता का एक बेहतर और असरदार क़ानून चाहिए, और वो भी जल्द-से-जल्द
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मेडिकल ख़र्च की त्रासदी

भारत को मेडिकल ख़र्च में पारदर्शिता का एक बेहतर और असरदार क़ानून चाहिए, और वो भी जल्द-से-जल्द

यूएसए के हेल्थकेयर और इंश्योरेंस सिस्टम में एक ट्रिलियन (दस अरब) प्राइस दिए गए हैं। ये नंबर मन में हादसा पैदा करता है, मगर लगता है कि ये सच है। इस साल जुलाई के महीने से, हेल्थकेयर के क्षेत्र में पारदर्शिता बढ़ाने वाले नए क़ानून के तहत, यूएस की हेल्थकेयर कंपनियों ने उन दामों का डेटा रिलीज़ करना शुरु किया है जो उन्होंने देश के हर अस्पताल से तय (negotiate) किए। इस नियम के पीछे सोच थी कि दामों में पारदर्शिता, ग्राहकों को हेल्थ इंश्योरेंस और इलाज की सबसे अच्छी डील चुनने में मदद करेगी। हालांकि, इंश्योरेंस इंडस्ट्री ने जो डेटा रिलीज़ किया, वो बेहद जटिल और बड़ा है, इतना ज़्यादा कि इससे क़ारगर जानकारी पाना अंसभव है। इस डेटा सेट का वृहद आकार और विश्लेषण, पर पढ़ा जा सकता है।
आप पूछ सकते हैं कि मैं इस विषय पर क्यों बात कर रहा हूं जबकि इस कॉलम के लिए मेरा ब्रीफ़, हमेशा से मेरे पाठकों से जुड़े पर्सनल फ़ाइनांस के मुद्दों पर लिखने का रहा है। इसका जवाब आसान है-हेल्थकेयर का ख़र्च वो आइसबर्ग है जो आपके पर्सनल फ़ाइनांस के जहाज़ की तरफ़ बहता हुआ बढ़ रहा है। भारत में हेल्थकेयर के ऊंचे ख़र्च में कोई पारदर्शिता नहीं है, ये उस हर इंसान के लिए बड़ी मुसीबत है जिसे हेल्थकेयर की ज़रूरत है। मगर भारतीय मिडिल क्लास के आर्थिक हालात और बचत पर इसका जैसा असर पड़ रहा है, वो किसी त्रासदी से कम नहीं। हम अच्छे से जानते हैं कि प्राइवेट हेल्थकेयर कंपनियों से होने वाली तक़रीबन हर मुठभेड़, ज़्यादातर भारतीयों के लिए एक बड़ा आर्थिक झटका होता है। किसी भी गंभीर बीमारी से सामना होने का मतलब है आपकी पांच, दस या इससे ज़्यादा बरसों की बचत और निवेश का आसानी से उड़न-छू हो जाना। एक तरफ़ ख़र्च के आंकड़ों का आकार और उससे आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाला बोझ बढ़ता जा रहा है, और दूसरी तरफ़ सर्विस की असल डिलिवरी पर सवालिया निशान भी बड़ा होता जा रहा है।
एक सबक़, जो बचत और फ़ाइनेंशियल प्लानिंग करने वालों ने चीनी वायरस के पूरे एपिसोड से लिया, वो ये था कि लोग हेल्थकेयर के संभावित ख़र्च की मद में कम पैसे रखते हैं। जैसे-जैसे आपकी उम्र बढ़ती जाती है, बड़े और ख़राब सेहत के झटकों की संभावना, हक़ीक़त में बदलती जाती है। तरीक़ा चाहे कोई भी हो, 55-60 साल की उम्र से लेकर मरने तक, कोई-न-कोई आपसे 10 या 20 या शायद 30 लाख रुपए झटक ही लेगा। ये होगा ही-इससे बचने का कोई तरीक़ा नहीं।
निजी स्तर पर इससे बचने के लिए आप ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते, सिवाए अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूत बनाने और सेहत की बेहतर देखभाल करके ख़ुद को तैयार रखने के। मगर एक दूसरी तरह के गहरे बदलाव की ज़रूरत है, और ये बदलाव रेग्युलेटरी सिस्टम की तरफ़ से आने चाहिए। दरअसल, हमें मेडिकल ख़र्च के सिस्टम में पारदर्शिता की सख़्त ज़रूरत है।
भारत में हेल्थकेयर के ख़र्च को लेकर पूरी अस्पष्टता है। अगर, आप एक मोबाइल फ़ोन ख़रीदना चाहते हैं या एक जोड़ी जूते लेना चाहते हैं या एक कार, तो अपना फ़ोन निकालिए और आपको उसका सही-सही ख़र्च तुरंत पता चल जाएगा। मगर यही चीज़ आप अस्पताल के एपिसोड के साथ नहीं कर सकते। नोट करें कि मैंने ‘अस्पताल के एपिसोड’ कहा, ‘मेडिकल प्रोसीजर’ नहीं। कुछ जगहों पर प्राइस और प्रोसीजर साझा करने की, एक तरह की झूठी पारदर्शिता का दिखावा चलन में है। जहां मूल ख़र्च तो दिख जाता है, मगर उसमें पहले ही इतना कुछ जोड़ दिया जाता है कि उसे देखना-न-देखना बेमानी हो जाता है।
ये ठीक वैसा ही है कि आप एक रेस्टोरेंट में जाएं और मेन्यू से कोई डिश ऑर्डर करें। पर जब बिल आए, तो आपको हर बार, अपने खाने में नमक छिड़कने के लिए पैसे लिए गए हों, और हर बार नेपकिन से अपना मुंह पोंछने के लिए भी अलग से चार्ज किया गया हो। यही नहीं, अगर वेटर ने अपनी मर्ज़ी से आकर आपसे पूछ लिया कि क्या ख़ाना ठीक था, तो उसे भी आपके बिल में ख़र्च के तौर पर जोड़ दिया गया हो। आपको ये मज़ाक लगेगा, मगर जिन्होंने भारत की किसी लुटेरी क़िस्म अस्पताल चेन में इलाज करवाया है, उनके कानों में ये बात अंतिम सत्य की तरह गूंजेगी।
तो, जिस पारदर्शिता की मैं बात कर रहा हूं वो असलियत में किस तरह काम करेगी, कि ये वैसा ही मज़ाक न बन जाए जैसा यूएस का हेल्थकेयर सिस्टम बन गया है? ये कुछ इस तरह होगा: हर कोई ऑनलाइन जा कर, किसी भी बीमारी के इलाज के लिए अस्पताल के कुल ख़र्च की स्थिति मोटे तौर पर देख सके। हर अस्पताल के औसत, मीडियन, न्यूनतम और अधिकतम दाम, किसी भी अवधि के लिए देखा जा सके। अगर कोई चाहे, तो उन्हें असली बिल का पूरा डीटेल, ब्रेकअप के साथ देखेने को मिल जाए।
जो लोग बीमारी के बिज़नस में हैं (और मैं ये टर्म इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूं क्योंकि इस इंडस्ट्री का एक हिस्सा बीमारी के बिज़नस में हैं, हेल्थकेयर के बिज़नस में नहीं) वो कहेंगे कि बिज़नस की ये जानकारियां गोपनीय हैं। हालांकि, इलाज के फ़ैसले लेते समय जिस तरह की मजबूरी ग्राहकों की होती है, उसे देखते हुए ऐसे किसी भी विरोध को सिरे से ख़ारिज और नज़रअंदाज़ कर देना चाहिए।


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